पढ़िए रामधारी सिंह “दिनकर” की कविता , समर निंद्य है / भाग 2

अहंकार के साथ घृणा काजहाँ द्वंद हो जारी;ऊपर, शान्ति, तलातल मेंहो छिटक रही चिंगारी; आगामी विस्फोट…

तुझे अब लौट आना चाहिए : एक कविता

नाराजगी थी या था कुछ और, मगर तुझे अब हर बात खुल कर बताना चाहिए तुझे…